अंतर्मन, शब्त्दतः गहन By Tarun Kumar Soni

अंर्मन, शब्त्दतः गहनत

तरुण कुमार सोनी 


हिमशिखर सा

विशाल, अस्तित्व विकराल 

गगनचुंबी, प्रत्यक्ष शिरोमणि 

शांतिपूर्ण, प्रदत्त समभाव 


जीवन भी कुछ ऐसा 

विकट बाधाओं से घिरा जैसा 

पर अंततः है 

सुखद, वाटिका की निर्मल छाँव 


कुछ पल ठहर कर 

सर्व चुनौतियों का निर्वहन कर 

कभी कभी कुछ समझ नहीं आता 

अस्तित्व धुंधला नजर आता है 


उसी क्षण,

दिल सर्वाधिक घबराता है 

तब उस वक़्त में 

आपका मित्र, चट्टान बन उभर आता है 


झेलता दुःख सारे 

देता सबल, 

प्रेम से निहारे 

शायद ये पल होते सबसे प्यारे 


हाथ लिखते लिखते कंपकपाने लगे हैं 

होंठ थरथराने लगे हैं 

आखिर, विषय ही है कुछ ऐसा 

सप्रेम, अनूठा जैसा 


शायद तुम्हें कुछ कह न पाऊँ 

गौरवगाथा प्रत्यक्ष सुना न पाऊँ 

शायद मेरी भित्ति ही कुछ ऐसी है 

सकुची, शर्मीली बन बैठी है 


पर, तुम समझ लेना 

भाव मन के 

आना जीवन की डूबती नैया में 

शशक्त नाव बन के 


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