पिता By Tarun Kumar Soni

पिता

पिता रोटी है, कपडा है, मकान है...
पिता नन्हे से परिंदे का बड़ा आसमान है 
नन्हीं किलकारियों के लिये प्यारी मुस्कान हैं 
भविष्य में सभी सुख देने को आतुर आरमान है

बच्चे के सारे दुखों को खुद झेलता 
बाधाओं से लड़ता,
टूटे अरमानों को पुनः समेटता 
फिर भी खड़ा होता समक्ष हंसकर

न जाने कहाँ से आता इतना सबल?
शायद हम ही उनकी खुशियों के राज हैं 
नये युग की आवाज हैं

आज फिर किसी ने बेटे होने का फर्ज निभाया है 
अपने पिता को गर्वानुभव करवाया है 
और उन्हें "वृद्धाश्रम" छोड़ आया है

आखिर हमें हो क्या गया है 
जिंदगी की आपाधापी में 
संस्कार कहीं खो सा गया है

वक़्त पुनः पलटी खायेगा 
बच्चू, तुम्हारा दिन भी आएगा 
जब तेरा सपूत, 'कपूत' बन जाएगा 
आखिर तब अपने कर्मों का फल पायेगा

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