"यारों" by Tarun Kumar Soni

"यारों"


छुपा लेता हूँ गम अक्सर 
आखिर, टूटते तारे कहाँ होते ऱोज मयस्सर

कब्रगाह में दफन हैं यादें मेरी 
आखिर, कोई तो आज़ाद कराओ यारों

तपती धुप में हूँ, तनहा खड़ा 
आखिर, कोई तो आवाज़ लगाओ यारों

अक्सर रो लेता हूँ बारिश में 
कौन जाने ये आंसू हैं या नभ की बूंदे?

आखिर तुमने भी कर ली रुखसत 
कब से थी जो आँखें मूंदे!

दुआ करते-करते, बीत गया अरसा 
आखिर, कोई तो मेरी फ़रियाद लगाओ यारों

अक्सर टूट जाते हैं खुशनुमा रिश्ते 
जिंदगी में आते, जैसे फ़रिश्ते 

नजरों से होते ओझल
रह जाते बस किस्से

मेरी गलती न कभी दुहराओ यारों 
आखिर, रिश्तों की डोर टूटने से बचाओ यारों

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

एक कहानी मेरी जुबानी

Where's is good in "Goodbye"

समय को जानें By Tarun Kumar Soni