"माँ" By Tarun Kumar Soni
माँ की महिमा को शब्दों के धागे और भावनाओं की मोतियों में पिरोने की सार्थक कोशिश को आपके समक्ष प्रस्तुत करते हुए अपार हर्ष का अनुभव हो रहा है!
कृपया इस लेख को अपनी माता को अवश्य दिखाएँ,जिससे ये रचना सार्थक हो सके!
माँ,
माँ कौन है?
देखती सब जग को है.
फिर भी मौन है!
माँ तो करुणामयी है,
जो वात्सल्य में न जाने क्या क्या कर जाती है...
वो चाहे तो ईश्वर से भी आपके प्राण वापस ले आती है
माँ बच्चे की गोद में,
ममता का आँचल फैलाती है,😋
जब तलक न सोये
मीठी लोरियां गुनगुनाती है 🤗
दो पल की ख़ुशी के लिए
सारे जहाँ की खुशियाँ बटोर लाती है
आखिर माँ ही तो वास्तव में
नीरस हो चुके घर को स्वर्ग सा बनाती है
बेगंध बगिया को, ममतत्व से सींचकर
खुशबु के महकाती है
माँ के चरणों से,
प्रेम की अविरल धरा का उद्गम होता है
आखिर माँ की गोद में ही तो
स्वर्ग बसता है
देवता भी, देवता की संज्ञा पाते हैं
जब अपने माँ के समक्ष शीश नवाते है
वो बच्चों संग खेलती है🎉
संग रोती, संग हंसती है
सर्वस्व दुःख को
बिना बताये न जाने कैसे झेलती है?
आखिर माँ का गौरवगान कहाँ ख़त्म होता है
उनकी ओज के समक्ष
सारा शब्दकोष फीका प्रतीत होता है
माँ,
आज फिर मुझे अपनी आँचल में समेट ले...
तेरा सर पे हाथ हो तो
सारे दुःख हँसते-हँसते झेल लें!
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