"काला रंग" By Tarun Kumar Soni

"काला रंग"

तरुण कुमार सोनी 


आज फिर उनसे मुलाकात हो गयी, 
मुलाकात क्या हुजुर..
यूँ कहें 
फिर 'मुक्का-लात' हो गयी..



पूछिए कैसे?
तो चलिए बताते है, 
आपको अपना दुखड़ा सुनते है... 
मैंने बत्तीसी निकली... 
और स्टाइल से बोला,
हाय... 

वो मुड़ी, और बोली, 
भाग कलमुहे बाय! 

लो भई,
फिर क्या था..
दिल 'जंपिंग-जपांग' हो गया था! 

आखिर क्यों न हो? 
पहली बार किसी ने मुझे,
ढंग से देखा था.
और मेरी खूबसूरती का.. 
उपसंहार किया था!

आखिर किसी ने तो सोचा,
काला रंग भी अनूठा होता है... 
जो अपने में 'अंधकार' को समेट लेता है...

फूलों की महक जो है मेरे आँगन में,💐
वो गुलाब के फूल का रंग 'काला' है... 
जिस आसमान में पक्षी चहक रहे हैं, 
उस आसमान का रंग 'काला' है...🌫️

ये अमावास की रात, 
घनघोर बरसात, 
वो डरावनी सी बात,😨
जैसे 
कालिया के दांत!😬

ये सूरज केवल 'वंदनीय' नहीं है...
रात भी 'प्रणम्य' है
जो हमें सपनो से भरा संसार दिखाती हैं... 
अपनों की खुशियों में नहलाती हैं... 
प्रियजनों की याद दिलाती है

हम अक्सर रात में रोते हैं, 
और उसी समय हम खुद से.. 
काफी ज्यादा करीब होते हैं!




















😘


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